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मृत्यु ईश्वर के अटल विधान का हिस्सा हैं ?
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✍️जब हम नहीं थे, तब भी संसार का सारा काम चल रहा था और जब नहीं रहेंगे, तब भी सब काम चलता रहेगा। संसार का कोई काम किसी के न रहने से रुकने वाला नहीं। कितने शूरमा, विभूतियाँ, महापुरुष और अवतारी पुरुष आए और गए, लेकिन समाज एवं सृष्टि की व्यवस्था अपनी गति से चल रही है और अपने गन्तव्य की ओर बढ़ रही है।
इस तरह मृत्यु ईश्वर के अटल विधान का हिस्सा है और इस सृष्टि के शाश्वत सौंदर्य का एक अभिन्न अंग भी, जिसके पीछे प्रकृति माँ के करुणा विधान को काम करते हुए देखा जा सकता है, जिसे कई उपमाओं से परिभाषित किया गया है। कुछ इसे महानिद्रा की संज्ञा देते हैं। दिन भर कठिन श्रम करते हुए जब हमारा शरीर थक जाता है, तो रात को सोना एक तरह से इस थकावट को मिटाने की प्रक्रिया है। रात को पूरी नींद लेने के बाद फिर हम अगले दिन के लिए तरोताजा एवं स्वस्थ होकर तैयार हो जाते हैं। नई शक्ति, स्फूर्ति और चेतनता के साथ दिन भर शाम तक अथक श्रम करते हैं।
मृत्यु भी जीवात्मा के लिए ठीक ऐसी ही स्थिति है। जीवन भर की थकावट मृत्यु की गोद में जाकर ही दूर होती है। ऐसे में अगले जीवन के लिए शक्तिदायिनी स्थिति का नाम ही मृत्यु है। इस तरह से विचार करें तो फिर मृत्यु से भय कैसा ? जबकि मृत्यु के उपरांत हमें नया जीवन, नई चेतना और नई स्फूर्ति प्राप्त होने वाली है। इस तरह देखा जाए तो मृत्यु ईश्वरीय योजना का एक करुण विधान है। दार्शनिक बेकन के शब्दों में, मृत्यु से नया जीवन मिलता है, केवल वहीं से जहाँ मनुष्य मृत्यु की गोद में सोता है, पुनरुत्थान का शुभारंभ होता है।
(संकलित व सम्पादित)
अखण्ड ज्योति पत्रिका मई 2025 पृष्ठ 22