तुर्की की संसद ने पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को मंजूरी दे दी है. राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के लिए इसे बड़ी कामयाबी माना जा रहा है. इस फैसले के बाद तीनों देशों के बीच सैन्य और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने का रास्ता खुल गया है।
समझौते का सबसे अहम प्रावधान है कि अगर तीन में से किसी एक देश पर बाहरी हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा. हालांकि, इस समझौते को लेकर तुर्की के अंदर ही सवाल उठने लगे हैं. कुर्द समर्थक DEM पार्टी ने इसका विरोध करते हुए भारत-पाकिस्तान के रिश्तों और यमन में संभावित सैन्य भूमिका का मुद्दा उठाया है.
279 सांसदों ने किया समर्थन, 119 ने किया विरोध
तुर्की की संसद में समझौते को मंजूरी देने वाले प्रस्ताव के पक्ष में 279 वोट पड़े, जबकि 119 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया. इसके साथ ही तुर्की ने समझौते को लागू करने की दिशा में जरूरी संसदीय प्रक्रिया पूरी कर ली है. पाकिस्तान और सऊदी अरब भी अपनी-अपनी मंजूरी की प्रक्रिया पूरी कर चुके हैं. यह समझौता 7 अगस्त 2026 को मक्का में हुआ था. इस पर तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए थे. हालांकि, समझौता औपचारिक रूप से तब लागू होगा, जब अंतिम मंजूरी से जुड़ा दस्तावेज समझौते के सचिवालय में जमा करा दिया जाएगा।
हमले की स्थिति में तीनों देश साथ आएंगे?
समझौते का मुख्य आधार सामूहिक रक्षा है. यानी अगर किसी एक सदस्य देश पर बाहरी हमला होता है, तो इसे तीनों देशों के खिलाफ हमला माना जाएगा. इसके बाद तीनों देश आपस में बातचीत कर तय करेंगे कि किस तरह की मदद दी जाए. इसका मतलब यह नहीं है कि हमला होते ही तुर्की की सेना पाकिस्तान या सऊदी अरब की तरफ से युद्ध में उतर जाएगी. समझौते में मदद का स्वरूप और उसका स्तर खतरे की स्थिति और तीनों देशों की सैन्य क्षमता को देखकर तय करने की बात है. तुर्की की सेना को विदेश में तैनात करने के लिए अलग से संसद की मंजूरी भी जरूरी होगी।
सऊदी अरब की सुरक्षा में तुर्की की भूमिका बढ़ सकती है
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सऊदी अरब को हूती हमलों से मिल रही चुनौती के बीच यह समझौता अहम माना जा रहा है. इसके जरिए तुर्की सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था में ज्यादा व्यवस्थित भूमिका निभा सकता है. इसमें खुफिया जानकारी साझा करना, सैन्य तकनीक, हवाई रक्षा, हथियारों के उत्पादन और सैन्य रसद से जुड़ा सहयोग शामिल हो सकता है. तीनों देशों के सैनिकों के बीच तालमेल बढ़ाने और संयुक्त सैन्य अभ्यास की संभावनाएं भी हैं.
समझौते के तहत एक 3+3 रणनीतिक राजनीतिक और रक्षा समिति बनाई गई है. इसमें तीनों देशों के विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और सैन्य प्रमुख शामिल हैं. इस समिति की अब तक दो बैठकें हो चुकी हैं. पहली बैठक 31 अगस्त को इस्तांबुल और दूसरी 5 अक्टूबर को रियाद में हुई थी. अक्टूबर की बैठक में सऊदी अरब के सामने मौजूद सुरक्षा चुनौतियों पर चर्चा की गई थी. इसी बैठक में पाकिस्तान के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल नौमान महमूद को गठबंधन का पहला महासचिव नियुक्त किया गया. उनका कार्यकाल तीन साल का होगा और गठबंधन का सचिवालय सऊदी अरब में होगा।
भारत का नाम लेकर तुर्की की संसद में उठे सवाल
समझौते को मंजूरी मिलने के बावजूद तुर्की में इसका विरोध भी हो रहा है. कुर्द-समर्थक पीपल्स इक्वेलिटी एंड डेमोक्रेसी पार्टी (DEM पार्टी) की डिप्टी ग्रुप लीडर गुलिस्तान किलिच कोचयिगित ने इस समझौते पर गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने पूछा कि तुर्की को किन संघर्षों में शामिल किया जा रहा है? उनका कहना था कि तुर्की के युवाओं को दूसरे देशों के हितों के लिए सैनिक बनकर अपनी जान गंवाने के लिए नहीं भेजा जा सकता. उन्होंने संसद में इस प्रस्ताव के खिलाफ खड़े होने की बात कही.
कोचयिगित ने समझौते के उस प्रावधान पर भी सवाल उठाया, जिसके तहत एक सदस्य देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा. उन्होंने भारत और पाकिस्तान का उदाहरण देते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच लगातार तनाव रहता है और दोनों परमाणु हथियारों से लैस हैं. उन्होंने सवाल किया कि अगर भविष्य में भारत पाकिस्तान पर हमला करता है, तो क्या तुर्की इसे अपने ऊपर हमला मानेगा? क्या ऐसी स्थिति में तुर्की पाकिस्तान की तरफ से युद्ध में उतरेगा? उनका कहना था कि तुर्की की संसद और जनता ने ऐसा कोई फैसला नहीं किया है, फिर देश को भारत-पाकिस्तान के संघर्ष का हिस्सा क्यों बनाया जा रहा है?









