नई दिल्ली: पिछले एशियन गेम्स में भारतीय महिला हॉकी टीम फाइनल तक पहुंचने में नाकाम रही थी. इसके बाद टीम का प्रदर्शन लगातार गिरता चला गया. हालात ऐसे बने कि भारतीय टीम पेरिस ओलंपिक 2024 के लिए क्वालिफाई भी नहीं कर सकी.
साल 2025 में उसे प्रो लीग से भी बाहर होना पड़ा. टीम ने लगभग सब कुछ गंवा दिया था और नौबत यहां तक पहुंच गई थी कि 2026 के वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई करना भी मुश्किल नजर आने लगा था. चीन के खिलाफ हारना भारतीय टीम की आदत बनती जा रही थी.
लेकिन इस पृष्ठभूमि में पिछले छह महीने की कहानी किसी बड़े नाटकीय बदलाव से कम नहीं है. वर्ल्ड कप में भारतीय टीम को सिर्फ ओलंपिक चैंपियन नीदरलैंड के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा. चीन के खिलाफ उसने दो बार बढ़त बनाने के बावजूद मुकाबला 2-2 से ड्रॉ खेला. इंग्लैंड के खिलाफ मैच गोलरहित बराबरी पर छूटा, जबकि ऑस्ट्रेलिया की टीम भी भारतीय डिफेंस को भेदने में नाकाम रही और मुकाबला 0-0 से समाप्त हुआ.
जापान में महिला टीम का जलवा
अब जापान में चल रहे एशियन गेम्स में भारतीय टीम का प्रदर्शन बेहद शानदार रहा है. सेमीफाइनल में दक्षिण कोरिया के खिलाफ जब ऐसा लगने लगा था कि मुकाबला पेनल्टी शूटआउट तक जाएगा, तब भारतीय खिलाड़ियों ने पेनल्टी कॉर्नर पर शानदार रणनीति अपनाते हुए पहला गोल दाग दिया. इसके कुछ ही देर बाद दूसरा गोल आया और भारत ने फाइनल का टिकट पक्का कर लिया.
कोच ने बदली सोच
इस बदलाव का काफी श्रेय कोच श्योर्ड मारिन को जाता है. उन्होंने टीम को सही दिशा दी है. हालांकि, इस भारतीय टीम में सबसे बड़ा बदलाव उसका आत्मविश्वास है. मिडफील्ड और फॉरवर्ड लाइन में अभी सुधार की गुंजाइश है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय टीम पहले के मुकाबले काफी बेहतर हो चुकी है. इससे कोच मारिन को एक मजबूत टीम तैयार करने के लिए पर्याप्त समय और मौका मिलेगा, जो ओलंपिक में पदक के लिए चुनौती पेश कर सके.
जीते गोल्ड तो ओलंपिक का टिकट पक्का
भारतीय महिला टीम के पास एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने का सुनहरा मौका है. इस स्वर्ण पदक के साथ लॉस एंजिलिस ओलंपिक 2028 का टिकट भी अपने आप मिल जाएगा. इस अभियान के दौरान भारतीय टीम की दो बातें खास तौर पर प्रभावित करने वाली रही हैं. पहली, खिलाड़ियों की शारीरिक फिटनेस. दूसरी, उनका मानसिक मजबूत होना और लक्ष्य को लेकर स्पष्टता. फिटनेस का असर मानसिक मजबूती पर भी पड़ता है, खासकर तब जब मुकाबले अपने आखिरी चरण में पहुंचते हैं. अक्सर ऐसे मौकों पर टीमें अंतिम मिनटों में गोल गंवा देती हैं, लेकिन भारतीय टीम में इस कमजोरी के संकेत नहीं दिखे हैं. यह टीम के लिए बड़ी सकारात्मक बात है.
चीन की चुनौती आसान नहीं
चीन की चुनौती बिल्कुल आसान नहीं होगी. उसे पता है कि भारत उसे कड़ी टक्कर देने की क्षमता रखता है. पिछले कुछ वर्षों में चीन ने भारत के खिलाफ हार का सामना नहीं किया है. ऐसे में गोल्ड मेडल के इस मुकाबले में काफी कुछ दांव पर लगा होगा. सविता पूनिया जैसी अनुभवी खिलाड़ी के लिए यह मुकाबला एक लंबे सफर के पूरा होने जैसा है. जब भारतीय टीम पेरिस ओलंपिक के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाई थी, तब सविता बेहद निराश हो गई थीं और उन्होंने संन्यास लेने तक के बारे में सोच लिया था. लेकिन उन्होंने खेलना जारी रखने का फैसला किया. शायद वह आज जैसे ही किसी खास दिन के इंतजार में थीं.
मेडल के साथ सुनहरा मौका
अगर भारत गोल्ड मेडल जीतकर ओलंपिक का टिकट हासिल कर लेता है, तो यह देश की सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाली खिलाड़ी सविता पूनिया के करियर के संघर्ष और वापसी की कहानी को एक यादगार मुकाम पर पहुंचा देगा. इसके साथ ही हॉकी इंडिया के भीतर चल रहे विवादों और सार्वजनिक रूप से सामने आ रही खींचतान से भी ध्यान हटकर मैदान पर खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर केंद्रित होगा. इसमें कोई शक नहीं कि एशियन गेम्स का यह गोल्ड मेडल भारतीय महिला हॉकी के लिए सबसे अहम पदकों में से एक साबित हो सकता है.
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