
मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना से मिला आर्थिक संबल, आधुनिक तकनीक अपनाकर मासिक आय ₹60 हजार तक पहुंची

(आशा भारती नेटवर्क)
अंबेडकर नगर 02 सितंबर 2026। किसी हुनर को यदि मेहनत, आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं का सहारा मिल जाए तो वही पारंपरिक कला आत्मनिर्भरता और समृद्धि का मजबूत आधार बन सकती है। जनपद अम्बेडकरनगर के पश्चिमी हिस्से में बसे छोटे से गांव गोबरहा बसन्तपुर निवासी श्री राजितराम प्रजापति की सफलता की कहानी इसी बदलाव की प्रेरणादायक मिसाल है।
वर्षों से पारिवारिक कुम्हारी कला से जुड़े राजितराम के लिए मिट्टी से बर्तन बनाना महज रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि उनकी पुश्तैनी कला, पहचान और विरासत थी। वे इस पारंपरिक व्यवसाय को विस्तार देकर एक बड़े स्वरोजगार के रूप में विकसित करना चाहते थे, लेकिन सीमित आर्थिक संसाधन, आधुनिक उपकरणों का अभाव और पर्याप्त कार्यशील पूंजी न होने के कारण उनका व्यवसाय स्थानीय स्तर तक ही सीमित था। मेहनत अधिक थी, लेकिन आमदनी अपेक्षाकृत कम थी।
सरकारी योजना बनी सपनों को उड़ान देने का माध्यम
वर्ष 2024 में राजितराम को उत्तर प्रदेश खादी तथा ग्रामोद्योग बोर्ड एवं उत्तर प्रदेश माटीकला बोर्ड की स्वरोजगारपरक योजनाओं की जानकारी मिली। उन्होंने अपने पारंपरिक हुनर को आधुनिक स्वरूप देने के उद्देश्य से संबंधित विभागों के सहयोग से ₹5.00 लाख के ऋण के लिए आवेदन किया।
विभागीय अधिकारियों के सहयोग एवं आवश्यक प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद बैंक ऑफ बड़ौदा, बसन्तपुर शाखा द्वारा उनका ₹5.00 लाख का ऋण स्वीकृत कर वितरित किया गया। योजना के अंतर्गत उन्हें नियमानुसार 25 प्रतिशत सब्सिडी/अनुदान का लाभ भी प्राप्त हुआ। इससे न केवल उन्हें अपना व्यवसाय विस्तार देने में आर्थिक सहायता मिली, बल्कि ऋण का वित्तीय भार भी काफी कम हुआ।
पारंपरिक चाक से आधुनिक मशीनों तक का सफर
ऋण राशि प्राप्त होने के बाद राजितराम ने अपने पारंपरिक व्यवसाय को आधुनिक तकनीक से जोड़ा। उन्होंने पुराने हाथ से चलने वाले चाक के स्थान पर इलेक्ट्रिक चाक की स्थापना की। मिट्टी तैयार करने की प्रक्रिया को आसान और तेज बनाने के लिए पग मिल मशीन लगाई। इससे श्रम और समय की बचत होने के साथ-साथ उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
तकनीक के साथ उन्होंने अपने उत्पादों में भी विविधता लाई। पहले जहां उनका व्यवसाय मुख्य रूप से पारंपरिक दीये और मटके बनाने तक सीमित था, वहीं अब वे मिट्टी के कप-प्लेट, गिलास, कुल्हड़ तथा विभिन्न उपयोगी उत्पाद तैयार कर रहे हैं। आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल इन उत्पादों की बाजार में बढ़ती मांग ने उनके व्यवसाय को नई गति प्रदान की।
तीन गुना उत्पादन, ₹60 हजार तक मासिक शुद्ध आय
आधुनिक उपकरणों और बेहतर कार्यप्रणाली का सीधा असर राजितराम के कारोबार पर पड़ा। मशीनों के उपयोग से उनका दैनिक उत्पादन लगभग तीन गुना हो गया। उत्पादन बढ़ने के साथ बाजार में उनकी पहुंच और आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
जहां पहले पारंपरिक तरीके से काम करते हुए उनके लिए परिवार का भरण-पोषण करना कठिन था, वहीं आज उनका शुद्ध मासिक मुनाफा लगभग ₹55,000 से ₹60,000 तक पहुंच गया है। यह आर्थिक बदलाव उनके परिवार के जीवन में खुशहाली लाने के साथ ही उनके आत्मविश्वास को भी मजबूत कर रहा है।
स्वयं आत्मनिर्भर बने, सात लोगों को दिया रोजगार
राजितराम की सफलता का प्रभाव केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं रहा। व्यवसाय के विस्तार के साथ उन्होंने स्थानीय स्तर पर 05 महिलाओं एवं 02 पुरुषों सहित कुल 07 लोगों को नियमित रोजगार उपलब्ध कराया है। इस प्रकार सरकारी योजना से प्राप्त आर्थिक सहायता ने न केवल एक पारंपरिक कारीगर को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि अन्य लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर सृजित किए।
राजितराम अपने परिवार के सदस्यों को भी व्यवसाय से जोड़कर पारंपरिक माटीकला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। इससे एक ओर जहां स्थानीय स्तर पर रोजगार का सृजन हो रहा है, वहीं दूसरी ओर मिट्टी से जुड़ी पारंपरिक कला और संस्कृति भी संरक्षित हो रही है।
समय पर ऋण अदायगी से जिम्मेदार उद्यमी की पहचान
व्यवसाय में हुई आय वृद्धि का सकारात्मक परिणाम यह भी है कि राजितराम बैंक ऑफ बड़ौदा, बसन्तपुर शाखा से प्राप्त ऋण की किस्तों का नियमित एवं समय पर भुगतान कर रहे हैं। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि उचित मार्गदर्शन, बैंकिंग सहयोग और सरकारी योजनाओं का प्रभावी उपयोग कर पारंपरिक व्यवसाय को लाभकारी उद्यम में बदला जा सकता है।
अन्य कारीगरों और युवाओं के लिए बने प्रेरणास्रोत
राजितराम प्रजापति की सफलता इस बात का जीवंत उदाहरण है कि सरकारी योजनाएं केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सही लाभार्थी तक पहुंचने पर वे हुनर को उद्यम, उद्यम को रोजगार और रोजगार को आत्मनिर्भरता में बदलने की क्षमता रखती हैं।
मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना के माध्यम से मिले ऋण एवं अनुदान और विभागीय-बैंकिंग सहयोग ने राजितराम के पारंपरिक हुनर को आधुनिक व्यवसाय का रूप दिया। आज वे स्वयं आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ सात अन्य लोगों को रोजगार प्रदान कर रहे हैं।
राजितराम कहते हैं कि यदि पारंपरिक कारीगरों को समय पर सरकारी योजनाओं की जानकारी, वित्तीय सहायता और आधुनिक तकनीक उपलब्ध हो, तो माटीकला केवल विरासत नहीं, बल्कि सम्मानजनक और लाभकारी रोजगार का मजबूत माध्यम बन सकती है।
उनकी यह उपलब्धि ग्रामीण युवाओं और अन्य कारीगरों को यह विश्वास दिलाती है कि मेहनत, हुनर और सरकारी योजनाओं के प्रभावी समन्वय से आत्मनिर्भरता की राह आसान हो सकती है। माटीकला के माध्यम से राजितराम ने न केवल अपने जीवन में आर्थिक बदलाव लाया है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन कर आत्मनिर्भर अम्बेडकरनगर की दिशा में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
जिलाधिकारी श्रीमती ईशा प्रिया ने कहा कि राजितराम प्रजापति की मेहनत एवं सफलता यह दर्शाती है कि पारंपरिक हुनर को आधुनिक तकनीक, वित्तीय सहायता और उचित मार्गदर्शन से जोड़कर उसे एक सफल एवं टिकाऊ स्वरोजगार में बदला जा सकता है। मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना का उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों को आर्थिक रूप से सशक्त करते हुए उनकी कला को बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना है। जनपद में पात्र कारीगरों एवं युवाओं तक स्वरोजगारपरक योजनाओं की जानकारी पहुंचाने तथा उन्हें योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए विभागीय स्तर पर निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि राजितराम जैसे सफल लाभार्थी अन्य कारीगरों और युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। सरकार की योजनाओं का लाभ लेकर युवा अपने पारंपरिक कौशल को आधुनिक उद्यम का स्वरूप दें और स्वयं आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ अन्य लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर सृजित करें।









